मैं अपने आप मे तुझ को तलाशता क्यूँ हूँ
ऐसे तो हर शक्स तुझ सा लगे जमाने मे
शाम सुबह जमीं आसमां चारसू तू ही तू है
इतनी सी थी बात जो मैं जान गया अनजाने मे
पड़ रहा है तेरा ही नूर मेरे चेहरे पर
वरना कौन देखता मुझे इस वीराने मे
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