Monday, February 15, 2010

सुखिया सब संसार खावे और सोवे


मेरे एक मित्र हैं, नेता टाइप। आजकल टाइप चलन में है। हॉलीवुड से लेकर बॉलीवुड और ऊपर से लेकर आम जिंदगी तक में सभी टाइप्ड हो जाना चाहते हैं। युवक लंबा हो तो अमिताभ टाइप और मांसल हो तो रितिक टाइप। इसलिए मैंने अपने मित्र को नेता टाइप कहा। पिछले दिनों मेरे इसी मित्र ने कहा था-तुम अजीब टाइप के आदमी हो यार। खैर, पिछले एक सप्ताह से मैं उनसे मिलने उनके घर जा रहा हूं, लेकिन मुलाकात नहीं होती। कल भी गया। उनकी श्रीमती जी ने धीरे से दरवाजा खोला और रटा-रटाया सा वाक्य दोहराया-अभी वे खाकर सो रहे हैं। मैं लौट पडा। मुझे तनिक भी गुस्सा नहीं आया। खाकर सोने की उनकी यह अदा मुझे बेहद पसंद है। मुझे विश्वास है, उनकी यह प्रैक्टिस रंग लाएगी। चुनाव के समय जागकर हरकत में आना और वोट खाकर अगले चुनाव तक के लिए सो जाना-नेताई मानक है। वाह! क्या अदा है, खाकर सोना। वैसे तो यह सामान्य मानव प्रवृत्ति है। शिशु खाते हैं और सोते हैं। यदि वे ऐसा न करें तो उन्हें अस्वस्थ मान लिया जाता है। आम आदमी जीविकोपार्जन के लिए दिन भर भाग-दौड करता है, खाता-पीता है और सो जाता है। घर पधारे मेहमान से पहले भोजन फिर विश्राम का आग्रह किया जाता है। मेहमाननवाजी का आनंद भी यही है। जमकर खाया और तान कर सोया जाए। आज खाने की होड सी लगी हुई है। खाने की कला में पारंगत ड्राई जगह में भी खाने की गुंजाइश पैदा कर लेते हैं। वे जगह की चिंता नहीं करते।
मयखाना पास न हो तो शराबी पीना नहीं छोड देते। खिला-पिलाकर काम निकालने की लंबी परंपरा है। खिलाने-पिलाने की गुंजाइश हो तो काम आसान हो जाते हैं। यहां न खाने वाला नकारा घोषित कर दिया जाता है और खाने वाला सम्मानित होता है। पिछले दिनों हमारा एक मित्र इसलिए परेशान था क्योंकि उसका पाला एक ईमानदार से पड गया था। ईमानदारी घातक है। कहावत है पेट खाली हो तो नींद नहीं आती। भूख से बेहोशी आती है। नींद के लिए मन का निश्चिंत होना आवश्यक है। निश्चिंतता के लिए जानवरों जैसी सोच चाहिए। जानवर सदैव निश्चिंत रहते हैं। कुत्ता गली में सो लेता है और घोडा खडे-खडे सो लेता है। सरकारी महकमों के बाबू कार्यालयीन समय में टांग उठाकर सो लेते हैं। बिना आंख झपकाए खुली आंखों से सो लेना कला नहीं तो क्या है?
पिछले सप्ताह शर्मा जी मिले। परेशान थे। एक ईमानदार आदमी का परेशान होना लाजिमी है। कहने लगे, किरायेदार मकान खाली नहीं कर रहा। बेटी की शादी सिर पर है।
मैं मुसकराया- शर्मा जी कहते थे कि उनका किरायेदार बडा भला है। अब कहां गई भलाई? किरायेदार की भलमनसाहत जांचनी हो तो उससे मकान खाली करने को कहें। फौरन गिरगिट की तरह रंग बदल लेगा। आपके सुख पर अतिक्रमण कर दुख ही दुख देगा। मेरी मुसकराहट और मौन से वे घबराए। बोले, सोहम् जी कोई रास्ता सुझाओ।
मैंने कहा, कोमल पहलवान से मिलो। कुछ खा-पीकर मामला निपटा देंगे।
शर्मा जी को मेरी सलाह जमी। बोले, साथ चलो। मैं उनके साथ हो लिया। वे मिठाई की दुकान में घुस गए। चार किलो गुलाबजामुन पैक करवाए तो मेरा दिमाग ठनका। मेरे खुराफाती दिमाग का कंप्यूटर शर्मा जी की ईमानदारी की कॉम्पैक्ट डिस्क रीड करने लगा। शर्मा जी के दिमाग में क्या चल रहा है, मैं समझ गया। अकेला आदमी कितना खाएगा? दो किलो गुलाबजामुन। पहलवान है तो ज्यादा से ज्यादा चार किलो गुलाबजामुन। शर्मा जी चार किलो गुलाबजामुन का पैकेट लेकर कोमल पहलवान के घर पहुंचे।
डोरबेल का स्विच दबाया। अंदर से गायत्री मंत्र का उद्घोष गूंजा। वे सहम गए, कहीं पहलवान जी की पूजा में खलल तो नहीं पड गया। वरना उनकेकोप का भाजन उन्हें बनना पडे। मैंने उनकी शंका का समाधान किया। इलेक्ट्रॉनिक डोरबेल में गायत्री मंत्र का उद्घोष पडा है। अब मंत्र का जाप करने में सुविधा है। बटन दबाओ और जाप शुरू हो जाता है। इलेक्ट्रॉनिक भक्तों की कमी नहीं है। सुबह- सुबह इलेक्ट्रॉनिक भक्ति का शोर सुनाई देने लगता है। ईमानदार व्यक्ति भगवान के नाम पर खुश हो जाता है। शर्मा जी भी खुश हो गए। हम सब ईश्वर की संतान हैं। वे सबका बराबरी से ध्यान रखते हैं। कोमल पहलवान जैसे लोगों का भी। वे ज्यादा आस्तिक होते हैं। किए गए पापों को धोने में आसानी रहती है।
तभी दरवाजा खुला और एक भारी-भरकम व्यक्ति प्रकट हुआ। वजनदार आवाज में प्रश्नों की झडी लगा दी, किसलिए आए हो..किससे मिलना है..क्या काम है..?
हमें कोमल पहलवान से मिलना है, हमने कहा और सामने खडा व्यक्ति गुस्से में आग बबूला हो गया। जैसे कह रहा हो मुझे नहीं पहचानता। एकबारगी लगा उसके कांपते शरीर से आंखों के अंगारे निकल कर बिखर जाएंगे, कहिए, मैं ही हूं। अंदर आ जाओ।
भय मिश्रित आश्चर्य से मैं गिरते-गिरते बचा। हम दोनों आत्मसमर्पण की मुद्रा में आ गए। बैठक में पहुंचकर सोफे पर लगभग गिर पडे। शर्मा जी ने मिठाई का पैकेट बढा दिया। वे बोले, मैं स्वीट नहीं लेता, डायबिटीज है।
फिर नमकीन वगैरह?
नहीं, नमक कम कर रखा है, बीपी के कारण।
अच्छा काम बताओ हम खुद खा लेंगे।
पहलवान जी मुद्दे पर आ गए।
यहां भी शर्मा जी की ईमानदारी आडे आई, लेकिन मेरे हस्तक्षेप से बात बनी और उनका काम हो गया। मैं सोचता हूं बिना खाए-पिए कोमल पहलवान जैसा व्यक्ति कितना खाया-पिया सा लगता है। इधर हमारा आलम यह है कि खाने के पहले दस बार सोचना पडता है। क्या खाएं और क्या न खाएं। हाजमा इस तरह बिगडा हुआ है कि खा लें तो पचाना मुश्किल है। अब तो खाना सुरक्षित भी नहीं है। रासायनिक खादों से उपजाए अनाज खाते-खाते आम आदमी के शरीर में रोगों की खर-पतवार उग आई है। डॉक्टरों के हुजूम में मेडिकल स्टोर्स के इर्द-गिर्द ऐसे लोगों को देखा जा सकता है। न जाने कब यमराज का बुलावा आ जाए कि चलो इस लोक के डॉक्टरों ने बहुत कर लिया मान्यवर मेंटीनेंस। अब ओवरहॉलिंग का समय आ गया। दूसरी बॉडी देनी पडेगी।
उफ! मैं क्या सोचने लगा। मैं क्यों परेशान हूं। इस दुनिया में तथाकथित खाने-पीने वाले लोग कितनी सुख की नींद सो रहे हैं। शायद मेरे जैसे मूड में आकर ही कबीर ने लिखा होगा- सुखिया सब संसार खावे और सोवे।

 

No comments:

Post a Comment