Friday, November 19, 2010

What shall we say that to love, where eyes So are found, but no eyes never meet

मोहब्बत में अश्क की कीमत कभी कमती नहीं
अंधेरे में रहकर भी रोशनी कभी मरती नहीं

नजरों का यह धोखा है वरना कभी
कहीं आसमां से धरती मिलती नहीं

चिनगारी होगी राख में दबी तो धुआँ उठेगा
ही, मोहब्बत की आग कभी छिपती नहीं

कहते हैं यह घर भूत का डेरा है, यहाँ
हजारों आत्माएँ रहती हैं,तभी तो यह ढहती नहीं

जिंदगी एक जंग है, हर साँस पर फ़तह होगी
ऐसी तकदीर , कभी किसी को मिलती नहीं

कौन कहता इश्क में हर मंजिल इन्किलाब है
आशिक की नीयत कभी बदलती नहीं

ऐसी मुहब्बत को हम क्या कहें, जहाँ आँखें
तो मिलती हैं, मगर नजरें कभी मिलती नहीं

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